• गुजरात चुनाव और 2002 का सबक !

    आखिरकार, अमित शाह ने सार्वजनिक रूप से 2002 के गुजरात के मुस्लिम-विरोधी नरसंहार के कर्ता या प्रायोजक के नाते, मोदी की भाजपा के लिए गुजरात के लोगों से वोट की मांग कर ही डाली

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    - राजेंद्र शर्मा

    वास्तव में मोदी-शाह की भाजपा शुरू से ही और हर जगह, इसी तरह के सांप्रदायिक धु्रवीकरण के ही आसरे रही है, पर गुजरात में तो खासतौर पर इसी के आसरे रही है। 2002 का विधानसभाई चुनाव, जिसे मोदी सरकार ने नरसंहार के बाद जल्द से जल्द कराने की कोशिश की थी और तत्कालीन चुनाव आयोग ने ही चुनाव थोड़ा पीछे खिसकाया था, तो जाहिर है कि 2002 के 'कारनामे' के बल पर ही मोदी ने लड़ा और जीता ही था, 2007 का अगला चुनाव भी मोदी ने ''वो पांच, उनके पच्चीस'' का मुकाबला करने के नारे पर लड़ा और जीता था!

    आखिरकार, अमित शाह ने सार्वजनिक रूप से 2002 के गुजरात के मुस्लिम-विरोधी नरसंहार के कर्ता या प्रायोजक के नाते, मोदी की भाजपा के लिए गुजरात के लोगों से वोट की मांग कर ही डाली। 1 और 5 दिसंबर को दो चरणों में होने जा रहे गुजरात के चुनाव के लिए प्रचार के अखिरी चरण में, मोदी के निर्विवाद नंबर-दो और देश के गृहमंत्री, अमित शाह ने खेड़ा जिले के महुधा शहर में एक चुनावी रैली में इसके श्रेय का दावा किया कि 2002 में मोदी जी के राज में ''सबक सिखाया गया था'', जिसके बाद से 'उन' तत्वों ने 'वह रास्ता छोड़ दिया। वे लोग 2002 से 2022 तक हिंसा से दूर रहे'। इस तरह मोदी के राज ने 'गुजरात में स्थायी शांति कायम की है!' कहने की जरूरत नहीं है कि वह इस 'गर्वपूर्ण' रिकार्ड के बल पर, दिसंबर के पहले सप्ताह में होने जा रहे मतदान में मोदी की भाजपा को एक बार फिर जिताने की गुजरात के लोगों से अपील कर रहे थे, ताकि 2002 के ''सबक'' से कायम हुई शांति को पांच साल और कायम रखा जा सके।

    बेशक, राजनीतिक रूप से बहुत ही भोले लोगों को छोड़कर, शायद ही किसी को इसमें अचरज हुआ होगा कि आखिरकार, मोदी की भाजपा चुनाव में 2002 के नरसंहार में अपनी भूमिका को खुलेआम भुनाने पर उतर आयी है। एक प्रकार से उसने 2002 के अपने सांप्रदायिक 'शौर्य' को चुनाव में भुनाने की तैयारियां तो तभी शुरू कर दी थीं, जब उस नरसंहार के भयानकतम प्रसंगों में से एक के रूप में कुख्यात, बिलकिस बानो सामूहिक बलात्कार तथा एक दर्जन से ज्यादा हत्याओं के प्रकरण के 11 सजायाफ्ता अपराधियों को, आजीवन कारावास की उनकी सजा को माफ करते हुए, आजादी के अमृत महोत्सव के हिस्से के तौर पर, इसी पंद्रह अगस्त को जेल से छोड़ दिया गया था।

    अचरज नहीं कि उनकी सजा माफी के लिए केस तैयार करने के लिए गठित की गयी कमेटी में, स्थानीय उच्चाधिकारियों के अलावा, भाजपा के स्थानीय विधायक समेत, ''सबक सिखाने'' के उक्त उद्यम के पैरोकारों का ही बोलबाला सुनिश्चित किया गया था। संबंधित विधायक, रावल जी ने, जिसका टिकट 40 फीसदी सिटिंग विधायकों के टिकट काटे जाने की आंधी में भी इस बार सुरक्षित रहा है, उक्त अपराधियों की सजा माफी का यह कहकर जोर-शोर से बचाव किया था कि वे तो निर्दोष थे, जो झूठे ही फंसाए गए थे। वे तो ''संस्कारी ब्राह्मïण'' हैं, वे ऐसा अपराध कर ही कैसे सकते थे? बेशक, ज्यादा शोर मचने पर मोदी की ''उत्तराधिकारी'' तथा सीधे उनके द्वारा ही नियुक्त की गयी, भूपेंद्र पटेल सरकार ने उक्त 'व्यापकतर कमेटी' के निर्णय की आड़ में शुरू में जिम्मेदारी से बचने की कोशिश भी की थी। लेकिन, बाद में सुप्रीम कोर्ट में उक्त सजा माफी को चुनौती दिए जाने पर, सुप्रीम कोर्ट के सामने दिए अपने हलफनामे में राज्य सरकार को कबूल करना पड़ा कि उक्त जघन्य अपराधियों की सजा, खुद अमित शाह के आधीन केंद्रीय गृहमंत्रालय के अनुमोदन से राज्य सरकार ने माफ की गयी थी! साफ है कि 2002 के ''सबक'' को इशारों में भुनाने की तैयारी तो तभी से शुरू हो गयी थी।

    इसी के हिस्से के तौर पर आगे चलकर, नरोडा पाट्या तथा नरोडा गांव नरसंहार प्रकरणों की मुख्य मास्टर माइंड मानी गयीं तथा इसी कारगुजारी के लिए बाद में मोदी निजाम में मंत्रिपद से भी नवाजी गयीं, डा. माया कोडनानी की सीट पर, जिन्हें सीबीआई की जांच तथा अरोपपत्र के आधार पर पहले निचली अदालत से 28 साल की सजा हुई थी, लेकिन बाद में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष, अमित शाह की गवाही के बाद उच्चतर न्यायालय द्वारा बरी कर दिया गया, उक्त नरसंहार के ही एक और आजीवन कारावास की सजा पाए अपराधी की डा. बेटी को, इस चुनाव में भाजपा का टिकट भी दिया गया। और अब तो खैर, खुद अमित शाह ने अपने मुंह से 2002 में ''सबक सिखाने'' के श्रेय का दावा ही पेश कर दिया है।

    बेशक, शाह के खुलकर ऐसा दावा पेश करने में, इस बार गुजरात में विधानसभा चुनाव में नजर आते रुझानों के कुछ न कुछ संकेत जरूर छुपे हुए हैं। लेकिन, इन संकेतों की चर्चा करने से पहले, यह याद दिला देना जरूरी है कि मोदी-शाह की भाजपा ने जब तक खुलकर, 2002 के नरसंहार की अपनी वीरता के लिए खुलकर, वोट मांगने का सहारा नहीं लिया था, तब भी वह चुनाव में सांप्रदायिक हिंदुत्ववादी धु्रवीकरण के ही आसरे थी, जिसके औजारों में नातिपरोक्ष तरीकों से 2002 की याद दिलाना भी शामिल था।

    वास्तव में मोदी-शाह की भाजपा शुरू से ही और हर जगह, इसी तरह के सांप्रदायिक धु्रवीकरण के ही आसरे रही है, पर गुजरात में तो खासतौर पर इसी के आसरे रही है। 2002 का विधानसभाई चुनाव, जिसे मोदी सरकार ने नरसंहार के बाद जल्द से जल्द कराने की कोशिश की थी और तत्कालीन चुनाव आयोग ने ही चुनाव थोड़ा पीछे खिसकाया था, तो जाहिर है कि 2002 के 'कारनामे' के बल पर ही मोदी ने लड़ा और जीता ही था, 2007 का अगला चुनाव भी मोदी ने ''वो पांच, उनके पच्चीस'' का मुकाबला करने के नारे पर लड़ा और जीता था!

    यहां तक कि 2017 का विधानसभाई चुनाव भी, नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री की हैसियत से अपने चेहरे पर लड़ने की कोशिश से शुरूआत जरूर की थी, जिसमें ''मुझे नीच कहा'' का खूब शोर मचाया जा रहा था, लेकिन आगे चलकर मोदी ने कांग्रेस नेता अहमद पटेल के नाम के सहारे, मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाने की पाकिस्तान की साजिश के झूठे प्रचार के रास्ते, सीधे सांप्रदायिक धु्रवीकरण को ही मुख्य सहारा बनाया था। इस बार भी, 2002 की 'कीर्ति' की ओर इशारों के अलावा, चुनाव सिर पर आता देखकर भाजपा, कॉमन सिविल कोड का अपना पुराना सांप्रदायिक धु्रवीकरणकारी दांव निकाल लायी थी। इसके लिए भाजपा की राज्य सरकार ने एक दिन अचानक, कॉमन सिविल कोड के लिए हाई कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में, एक कमेटी के गठन के निर्णय का एलान कर दिया और अब हिमाचल की ही तरह गुजरात में भी, भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में इसे पहले नंबर पर रखा गया है। आगे निजी और सरकारी संपत्ति के नुकसान की वसूली के कानून बनाने के यूपी मॉडल के वादे भी हैं।

    फिर भी शायद, इसके फौरन बहुत काम करते दिखाई न देने के चलते, गुजरात में भाजपा के लिए चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे, असम के भाजपायी मुख्यमंत्री, हिमांत बिश्वशर्मा ने दिल्ली में हुई लिव-इन पार्टनर की जघन्य हत्या की वारदात को, हत्या के आरोपी के धर्म के आधार पर, सांप्रदायिक धु्रवीकरण का हथियार बनाते हुए, 2024 में नरेंद्र मोदी को तीसरी बार जिताने की दलील पेश कर दी, वर्ना शहर-शहर में 'शहजादों को पैदा होने से नहीं रोका जा सकेगा!' वैसे इसमें भी, एक खुल्लमखुल्ला सांप्रदायिक अपील के साथ ही, 2002 के ''सबक'' की ओर इशारा जरूर था। बहरहाल, अब जबकि अमित शाह ने खुलकर, उक्त ''सबक सिखाने'' के श्रेय का दावा कर ही दिया है, बस खुद नरेंद्र मोदी के अपने मुंह से ऐसा दावा करने की कमी रह जाती है।

    वैसे प्रधानमंत्री मोदी भी, प्रचार के आखिरी चरण के आते-आते, अपने राजनीतिक विरोधियों को अपनी तुष्टïीकरण की राजनीति के लिए आतंकवादियों की हिमायत करने वाले बताने के जरिए, खासतौर पर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को आतंकवाद का पर्याय ठहराने तक तो जा भी चुके हैं। यहां से 'हां मैंने सबक सिखाया' कहना, एकाध ही कदम दूर रह जाता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि अंतत: प्रधानमंत्री मोदी खुद अपने मुंह से 2002 के ईनाम में वोट मांंगते हैं या बस इतना भर करने का जिम्मा अपने नंबर दो पर ही छोड़े रहते हैं।

    कहने की जरूरत नहीं है कि मोदी-शाह की भाजपा को अगर सीधे अपने बहुसंख्यकवादी समर्थकों को 2002 की याद दिलाना जरूरी लग रहा है, तो यह कम से कम इतना तो दिखाता ही है कि इस बार के विधानसभाई चुनाव में ख्ुाद भाजपा को आसान जीत की उम्मीद नहीं है। यह उसके नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ने के बावजूद है। वैसे प्रधानमंत्री के चेहरे पर तो भाजपा अब दिल्ली नगर निगम का चुनाव भी लड़ रही है, फिर भी गुजरात में अपने पहले प्रधानमंत्री के चेहरे का आकर्षण कहीं ज्यादा काम करेगा। बेशक, इसके पीछे 2017 के गुजरात के चुनाव के अनुभव से निकली अतिरिक्त सावधानी भी होगी, जब कांग्रेस ने भाजपा के पसीने छुड़वा दिए थे और उसे 100 के आंकड़े से नीचे ही रोक दिया था।

    बेशक, उसके बाद से टार्गेटेड दलबदल-नेता खरीद आदि के जरिए, भाजपा ने राज्य में कांग्रेस को सांगठनिक तौर पर काफी कमजोर कर दिया है और दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी के रूप में एक नये दावेदार के उभरने से, भाजपा विरोधी वोट का पिछले अनेक चुनावों की तुलना मेंं ज्यादा बंटना तय है। इसके बावजूद, मोदी-शाह की जोड़ी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है क्योंकि उन्हें इसका बखूबी एहसास है कि कथित गुजरात मॉडल, मेहनतकशों के विशाल हिस्सों की तकलीफें दिन पर दिन बढ़ाने वाला मॉडल साबित हो रहा है। इसके चलते, हिंदुत्ववादी बहुसंख्यकवादी धु्रव पर शहरी-संपन्न-सवर्ण गोलबंदी का कोर काफी हद तक बचा रहने के बावजूद, उसके प्रभाव का दायरा घटता जा रहा है और दूसरी ओर मौजूदा निजाम से असंतुष्टï वंचितों का हिस्सा, बहुत एकजुट भले ही नहीं हो, बढ़ता जा रहा है

    । इसी बदलतेे संतुलन का डर है जो अपने शहरी-संपन्न-सवर्ण समर्थन आधार को फिर से जोश दिलाने के लिए, मोदी-शाह की जोड़ी को 2002 की याद दिला रहा है। अब यह तो 8 दिसंबर को ही पता चलेगा कि भाजपा, इस काठ की हांड़ी में पकाकर एक बार फिर गुजरात में सत्ता का स्वाद ले पाएगी या इस बार काठ की ये हांड़ी ही जल जाएगी।

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